गीत


मौन

खो न दूँ अस्तित्व अपना विश्व के अविरल तुमुल में
इसलिए कुछ देर ख़ुद में ही ठहरना चाहती हूँ !
मौन की नीरव गहनता में उतरना चाहती हूँ !

आज कोई प्रश्न मुझसे पूछ कर उत्तर न माँगो
अक्षरों से इस हृदय को भेदकर अक्षर न माँगो
शून्यता को जानने दो,भूलने दो विश्व सारा
खोजने दो आज अपने आप में अपना सहारा

फिर नया सा रूप धरने मैं तरंगों की तरह ही
शांत स्थिर इक पुलिन को छू बिखरना चाहती हूँ !

मोम के जैसा गलेगा देखना हर एक संशय
कर सका है कब भला नेपथ्य में किरदार अभिनय
बंद कर अपने दृगों को,चाहती हूँ पार देखूँ
सोचती हूँ आज अपनी सोच की ही धार देखूँ

सत्य कितना भी रुलाए,सत्य के सम्मुख रहूँगी
अश्रुओं की धार में धुल धुल निखरना चाहती हूँ !

बाहरी आडंबरों को लाद कुछ मिलता नहीं है
मोह का धागा भले हो,घाव तो सिलता नहीं है
आत्मा पर शांति का टीका लगाना चाहती हूँ
और उसपर प्रेम का अक्षत सजाना चाहती हूँ

देह के शृंगार अनगिन बार कितने कर चुकी हूँ
आज भीतर से तनिक सजना सँवरना चाहती हूँ !


©अंकिता सिंह


 

प्रेमगीत

जीवन का प्रारब्ध है मृत्यु,आज नहीं तो कल आयेगी
पर मैं अपने प्रेम गीत से ,तुमको प्राण अमर कर दूँगी !
शब्द शब्द तुमसे धड़केगा,अर्थ अर्थ तुमको बांचेगा
अमर प्रेम के अमर गीत का ,मैं तुमको अक्षर कर दूँगी !!!!

बिन मंत्रों के यज्ञ अधूरा,बिन ओंकारा मंत्र अधूरा
बिन गीतों के ,बिना प्रीति के,मानुष जीवन होय न पूरा
जैसे प्राण भरे ओंकारा,गूँज गूँज सम्पूर्ण सृष्टि में
वैसे ही प्रेमी हृदयों का ,तुमको गुंजित स्वर कर दूँगी !

जब जब जग में कोई प्रेमी,एकाकी विरहाकुल होगा
बैठ प्रिया के पास अनकहा,कुछ कहने को व्याकुल होगा
तब तब मेरे गीत सजेंगे,उद्गारों के नर्म अधर पर
प्रेम भाग्य में आने वाला,तुमको हर अवसर कर दूँगी!!!

पर्वत से उतरी नदिया मैं,कल कल कल कल बहती जाती
मन में बहते भाव नीर को,तीर तीर पर हूँ छलकाती,
तुम पर ख़ुद को कर न्योछावर,मुझको भी निर्वाण मिलेगा
काल वक्ष पर तुम्हें सजाकर,लहराता सागर कर दूँगी !

प्रेम जियूँ मैं प्रेम लिखूँ मैं,केवल गीत प्रेम के गाऊँ
भूल जगत को भूल स्वयं को,प्रेम धार में बहती जाऊँ
मैं मीरा हूँ या राधा हूँ,इसका मुझको ज्ञान नहीं है
तुम्हें पूज पर गीतों से मैं,सचमुच का गिरिधर कर दूँगी !


©️अंकिता सिंह


 

गीत कितने लिख दिए तुमपर!

गीत कितने लिख दिए तुमपर,
कभी भी
गुनगुनाने का इन्हें क्या
मन नहीं करता ?
तुम्हारा मन नहीं करता ?

लिख दिया जिनमें कड़कती घनप्रिया का नाद मैंने
लिख दिया झमझम बरसते मेघ का आह्लाद मैंने
तुम उपेक्षित कर इन्हें औंधे पड़े हो फेर कर मुख

मैं हज़ारों बार यूँ आवाज़ देकर थक गयी हूँ
और तुम चुप ,
मौन से क्या मन नहीं भरता?

तुम कई सूरज छुपाए हो मधुर मुस्कान में ही
कर रहे लेकिन कृपणता एक रवि के दान में ही
क्या स्वयं को गीत में सुन हर्ष होता है न तुमको

बावली मैं भी लगी हूँ मन मनाने मारने में
थक चुकी मैं
पर हठी ये मन नहीं मरता!

रख दिए थे कुछ सुवासित गीत सिरहाने तुम्हारे
भोर में छू कर तुम्हें फिर खिल गए हैं बंध सारे!
ये कहीं अवहेलना की धूप में मुरझा न जायें

फूल से हैं गीत मेरे तुम ज़रा सा ध्यान दे दो
देख लो ना
फूल से अब रंज है झरता ! (रंज:पराग)

©️अंकिता सिंह


 

मौन सिंधु

मौन सिंधु के तले सहस्त्र शब्द सीप हैं !
डूब डूब चेतना अजस्त्र सीप चुन रही! (अजस्त्र:लगातार)

अनकहा रहा कभी,हुआ मुखर मुखर अभी
दीप बातचीत का हुआ प्रखर प्रखर तभी
कह रही स्वयं,स्वयं सुनूँ सभी कहा हुआ
इस तरह समझ रही जटिल यथार्थ अनछुआ

दूर विश्व से कटी हुई पड़ी ज़मीन पर
आज प्राण में विलुप्त एक विश्व सुन रही !

शांत शांत प्राण में भरा हुआ प्रमाद है
गीत प्राण के उसी प्रमाद का निनाद है
अब इसे दबा सकूँ न अब इसे छुपा सकूँ
तो बता मुझे,इसे सहेज कर कहाँ रखूँ ?

गुनगुना रहा हृदय व पाँव भी थिरक रहे
और रूह दूसरा सुरम्य गीत गुन रही !!

दब चुके सपन सभी प्रकट हुए निखर गए
बीज बीज बढ़ गए घने विटप उभर गए (विटप:पेड़)
छांव छांव ठंड है व शांति की बयार है
विश्व में चलो कहीं मिला मुझे न क्षार है

एक स्वप्न जी रही,यक़ीन हो रहा नहीं
और मौन व्यंजना अनेक स्वप्न बुन रही!


©अंकिता सिंह


 

पीड़ा का गीत

हृदय द्वार पर स्वप्न कलश रख
मुस्कानों की सजा रंगोली
कब से तेरी बाट निहारूँ
पीड़ा आओ! अभिनंदन है !

कलश गिराना निर्मम होकर
हाँ!हाँ!मुझको ख़ूब रुलाना
आसपास के सब लोगों की
मुझको असली शक्ल दिखाना
अबकी निर्णय हो ही जाए
कौन है अपना कौन पराया
इस दुनिया में अपना बनकर
छलने का तो ख़ूब चलन है !

ऐसी चोट करो मन पर जो
समझ ज़रा मेरी जग जाये
मन के भीतर दुबके साहस
से मेरा परिचय हो पाये
सुख की छाया में पलने से
सोना मिट्टी रह जाएगा
पीड़ा ! मुझको और जलाओ
मेरे अंतर में कुंदन है !

नहीं भोग पायी जो दुःख को
परपीड़ा कैसे समझूँगी
बिना अश्रुओं को ढुलकाए
मुस्कानों का मोल करूँगी ?
मुझपर अपना प्रेम लुटाओ
तो मैं सक्षम बन पाऊँगी
मेरे आँसूँ से मत डरना
गीतों का उद्ग़म क्रंदन है !

©अंकिता सिंह


 

लेखनी

लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

गद्य निकले हैं कई,निकले न जाने पद्य कितने
नोक से हैं शब्द निकले व्योम में नक्षत्र जितने
ऊर्जा उपजी विचारों से उतर इसमें समाई
तब अंधेरों में क़लम बिखरा सकी उज्जवल रुनाई
मृदुल मन के भाव के हर रंग में ढलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

तुम न इसको क्षीण समझो,है क़लम तलवार कोई
हो गयी है ये पुरानी पर न इसने धार खोयी
काट डाले शीष इसने धूर्त और अपराधियों के
मोड़ डाले रुख़ उमड़ती धूल वाली आँधियों के
दोगली हर शक्ल पर ये श्याम रंग मलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !!

दम नहीं है ये किसी में, वेग इसका रोक पाए
सब लिखेगी ये क़लम जिस आसमां तक सोच जाए
तेज़ इसकी निर्भया जिह्वा हमेशा सत्य कहती
भाव की सौ लाख नदियाँ इस तरल स्याही में बहतीं
चोट खायी आत्मा के प्राण में पलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !!!

दे रहा आराम रिसते घाव को हर शब्द इसका
पीर जो भी लिख रहा है गा रहा है कंठ उसका
देख लो कैसे मधुरता में बदलती वेदना है
पूर्व सिलने के मगर पहले वसन को भेदना है
ये क़लम चुपचाप हर इक घाव को सिलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

©अंकिता सिंह


 

तुम हमारी चेतना हो !

तुम हमारी चेतना हो, सोच हो, संवेदना हो,
क्या करें ? तुमसे अलग कुछ सोचना आता नहीं है!

ध्यान पर बैठें कभी तो ध्यान में भी शेष हो तुम
शून्यता पाना असम्भव,भाव का आवेश हो तुम
खो चुके तुममें,तुम्हीं को खोजते दिन रात हैं हम
जो शुरू तुमसे,तुम्हीं पर ख़त्म हो वो बात हैं हम

दूर कितना आ गए हैं खोजते तुमको हुए हम
तुम मिलो या ना मिलो अब लौटना आता नहीं है !

शांति का तुम रास्ता हो,व्यस्तता के जंगलों में
और हलचल हो हृदय की शांत फ़ुर्सत के पलों में
नेह मलयानिल तुम्हीं हो,नेह की हो उष्णता भी
रिक्तता भी हो हृदय की,हो हमारी पूर्णता भी

सामने तुम हो न हो पर दृश्य तुम ही हो दृगों का
अब परे इसके हमें कुछ देखना आता नहीं है !

साँस का हर तार तुमसे,तार की झंकार भी तुम
गीत का उदगम तुम्हीं से ,गीत की गुंजार भी तुम
मुस्कुराहट हो हमारी,अश्रुओं की पंक्ति भी हो
मन द्रवित कर दो क्षणों में,पर हमारी शक्ति भी हो

डूबते ही जा रहे हैं जान कर ख़ुद प्रेम में हम
तृण बचा ले जो हमें वो थामना आता नहीं है !

©अंकिता सिंह