गीत


मौन

खो न दूँ अस्तित्व अपना विश्व के अविरल तुमुल में
इसलिए कुछ देर ख़ुद में ही ठहरना चाहती हूँ !
मौन की नीरव गहनता में उतरना चाहती हूँ !

आज कोई प्रश्न मुझसे पूछ कर उत्तर न माँगो
अक्षरों से इस हृदय को भेदकर अक्षर न माँगो
शून्यता को जानने दो,भूलने दो विश्व सारा
खोजने दो आज अपने आप में अपना सहारा

फिर नया सा रूप धरने मैं तरंगों की तरह ही
शांत स्थिर इक पुलिन को छू बिखरना चाहती हूँ !

मोम के जैसा गलेगा देखना हर एक संशय
कर सका है कब भला नेपथ्य में किरदार अभिनय
बंद कर अपने दृगों को,चाहती हूँ पार देखूँ
सोचती हूँ आज अपनी सोच की ही धार देखूँ

सत्य कितना भी रुलाए,सत्य के सम्मुख रहूँगी
अश्रुओं की धार में धुल धुल निखरना चाहती हूँ !

बाहरी आडंबरों को लाद कुछ मिलता नहीं है
मोह का धागा भले हो,घाव तो सिलता नहीं है
आत्मा पर शांति का टीका लगाना चाहती हूँ
और उसपर प्रेम का अक्षत सजाना चाहती हूँ

देह के शृंगार अनगिन बार कितने कर चुकी हूँ
आज भीतर से तनिक सजना सँवरना चाहती हूँ !


©अंकिता सिंह


 

प्रेमगीत

जीवन का प्रारब्ध है मृत्यु,आज नहीं तो कल आयेगी
पर मैं अपने प्रेम गीत से ,तुमको प्राण अमर कर दूँगी !
शब्द शब्द तुमसे धड़केगा,अर्थ अर्थ तुमको बांचेगा
अमर प्रेम के अमर गीत का ,मैं तुमको अक्षर कर दूँगी !!!!

बिन मंत्रों के यज्ञ अधूरा,बिन ओंकारा मंत्र अधूरा
बिन गीतों के ,बिना प्रीति के,मानुष जीवन होय न पूरा
जैसे प्राण भरे ओंकारा,गूँज गूँज सम्पूर्ण सृष्टि में
वैसे ही प्रेमी हृदयों का ,तुमको गुंजित स्वर कर दूँगी !

जब जब जग में कोई प्रेमी,एकाकी विरहाकुल होगा
बैठ प्रिया के पास अनकहा,कुछ कहने को व्याकुल होगा
तब तब मेरे गीत सजेंगे,उद्गारों के नर्म अधर पर
प्रेम भाग्य में आने वाला,तुमको हर अवसर कर दूँगी!!!

पर्वत से उतरी नदिया मैं,कल कल कल कल बहती जाती
मन में बहते भाव नीर को,तीर तीर पर हूँ छलकाती,
तुम पर ख़ुद को कर न्योछावर,मुझको भी निर्वाण मिलेगा
काल वक्ष पर तुम्हें सजाकर,लहराता सागर कर दूँगी !

प्रेम जियूँ मैं प्रेम लिखूँ मैं,केवल गीत प्रेम के गाऊँ
भूल जगत को भूल स्वयं को,प्रेम धार में बहती जाऊँ
मैं मीरा हूँ या राधा हूँ,इसका मुझको ज्ञान नहीं है
तुम्हें पूज पर गीतों से मैं,सचमुच का गिरिधर कर दूँगी !


©️अंकिता सिंह


 

गीत कितने लिख दिए तुमपर!

गीत कितने लिख दिए तुमपर,
कभी भी
गुनगुनाने का इन्हें क्या
मन नहीं करता ?
तुम्हारा मन नहीं करता ?

लिख दिया जिनमें कड़कती घनप्रिया का नाद मैंने
लिख दिया झमझम बरसते मेघ का आह्लाद मैंने
तुम उपेक्षित कर इन्हें औंधे पड़े हो फेर कर मुख

मैं हज़ारों बार यूँ आवाज़ देकर थक गयी हूँ
और तुम चुप ,
मौन से क्या मन नहीं भरता?

तुम कई सूरज छुपाए हो मधुर मुस्कान में ही
कर रहे लेकिन कृपणता एक रवि के दान में ही
क्या स्वयं को गीत में सुन हर्ष होता है न तुमको

बावली मैं भी लगी हूँ मन मनाने मारने में
थक चुकी मैं
पर हठी ये मन नहीं मरता!

रख दिए थे कुछ सुवासित गीत सिरहाने तुम्हारे
भोर में छू कर तुम्हें फिर खिल गए हैं बंध सारे!
ये कहीं अवहेलना की धूप में मुरझा न जायें

फूल से हैं गीत मेरे तुम ज़रा सा ध्यान दे दो
देख लो ना
फूल से अब रंज है झरता ! (रंज:पराग)

©️अंकिता सिंह


 

मौन सिंधु

मौन सिंधु के तले सहस्त्र शब्द सीप हैं !
डूब डूब चेतना अजस्त्र सीप चुन रही! (अजस्त्र:लगातार)

अनकहा रहा कभी,हुआ मुखर मुखर अभी
दीप बातचीत का हुआ प्रखर प्रखर तभी
कह रही स्वयं,स्वयं सुनूँ सभी कहा हुआ
इस तरह समझ रही जटिल यथार्थ अनछुआ

दूर विश्व से कटी हुई पड़ी ज़मीन पर
आज प्राण में विलुप्त एक विश्व सुन रही !

शांत शांत प्राण में भरा हुआ प्रमाद है
गीत प्राण के उसी प्रमाद का निनाद है
अब इसे दबा सकूँ न अब इसे छुपा सकूँ
तो बता मुझे,इसे सहेज कर कहाँ रखूँ ?

गुनगुना रहा हृदय व पाँव भी थिरक रहे
और रूह दूसरा सुरम्य गीत गुन रही !!

दब चुके सपन सभी प्रकट हुए निखर गए
बीज बीज बढ़ गए घने विटप उभर गए (विटप:पेड़)
छांव छांव ठंड है व शांति की बयार है
विश्व में चलो कहीं मिला मुझे न क्षार है

एक स्वप्न जी रही,यक़ीन हो रहा नहीं
और मौन व्यंजना अनेक स्वप्न बुन रही!


©अंकिता सिंह


 

पीड़ा का गीत

हृदय द्वार पर स्वप्न कलश रख
मुस्कानों की सजा रंगोली
कब से तेरी बाट निहारूँ
पीड़ा आओ! अभिनंदन है !

कलश गिराना निर्मम होकर
हाँ!हाँ!मुझको ख़ूब रुलाना
आसपास के सब लोगों की
मुझको असली शक्ल दिखाना
अबकी निर्णय हो ही जाए
कौन है अपना कौन पराया
इस दुनिया में अपना बनकर
छलने का तो ख़ूब चलन है !

ऐसी चोट करो मन पर जो
समझ ज़रा मेरी जग जाये
मन के भीतर दुबके साहस
से मेरा परिचय हो पाये
सुख की छाया में पलने से
सोना मिट्टी रह जाएगा
पीड़ा ! मुझको और जलाओ
मेरे अंतर में कुंदन है !

नहीं भोग पायी जो दुःख को
परपीड़ा कैसे समझूँगी
बिना अश्रुओं को ढुलकाए
मुस्कानों का मोल करूँगी ?
मुझपर अपना प्रेम लुटाओ
तो मैं सक्षम बन पाऊँगी
मेरे आँसूँ से मत डरना
गीतों का उद्ग़म क्रंदन है !

©अंकिता सिंह


 

लेखनी

लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

गद्य निकले हैं कई,निकले न जाने पद्य कितने
नोक से हैं शब्द निकले व्योम में नक्षत्र जितने
ऊर्जा उपजी विचारों से उतर इसमें समाई
तब अंधेरों में क़लम बिखरा सकी उज्जवल रुनाई
मृदुल मन के भाव के हर रंग में ढलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

तुम न इसको क्षीण समझो,है क़लम तलवार कोई
हो गयी है ये पुरानी पर न इसने धार खोयी
काट डाले शीष इसने धूर्त और अपराधियों के
मोड़ डाले रुख़ उमड़ती धूल वाली आँधियों के
दोगली हर शक्ल पर ये श्याम रंग मलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !!

दम नहीं है ये किसी में, वेग इसका रोक पाए
सब लिखेगी ये क़लम जिस आसमां तक सोच जाए
तेज़ इसकी निर्भया जिह्वा हमेशा सत्य कहती
भाव की सौ लाख नदियाँ इस तरल स्याही में बहतीं
चोट खायी आत्मा के प्राण में पलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !!!

दे रहा आराम रिसते घाव को हर शब्द इसका
पीर जो भी लिख रहा है गा रहा है कंठ उसका
देख लो कैसे मधुरता में बदलती वेदना है
पूर्व सिलने के मगर पहले वसन को भेदना है
ये क़लम चुपचाप हर इक घाव को सिलती रहेगी
लेखनी चलती रहेगी...लेखनी चलती रहेगी !

©अंकिता सिंह


 

हो गया है यक्ष जैसा मन

देख कर आकाश में उड़ते हुए बादल ....
भीगकर सहसा तुम्हारी याद में पागल
हो गया है यक्ष जैसा मन !!!!!!
हो गया है यक्ष जैसा मन!

दे दिया है बादलों को पत्र मैंने
मन करे तो बाँच लेना प्यार मेरा
मात्र अक्षर की नहीं ये शब्द माला
है विकलता का सघन संसार मेरा,

बिन तुम्हारे मन बना वीरान सा मरुथल
एक मृगतृष्णा चिढ़ाती है मुझे प्रतिपल
जबकि आँखों में घिरा सावन!

अनगिनत कोशिश विकल मन कर चुका है
पर विवशता को नहीं है लाँघ पाया
पिस गया धरती गगन के बीच में पर
एक क्षण तुमको नहीं इसने भुलाया

ये हवा छू खोलती है याद के साँकल
तुम बजा देते थे ऊँगली से मेरी पायल
जी हुआ है देख लूँ दर्पण!

बारिशों से भर रहे हैं ताल नदियाँ
और ये मन रिक्त होता जा रहा है,
ख़त्म होंगे कब विरह के ये निठुर पल
प्रेम भी अस्तित्व खोता जा रहा है!

भावना के पर्वतों पर मन पड़ा घायल..
जो चपल था भूल बैठा आज हर हलचल
छू इसे दे दो नया जीवन!

©अंकिता सिंह


 

अगर कम बात हो तो शाद रहना फिर भी आसां है!

अगर कम बात हो तो शाद रहना फिर भी आसां है,
मगर बिन बात के जीना बड़ा बेज़ार करता है !

तुम्हारी याद की रस्सी पकड़कर खींच लेती है
हमारी जान को चारों तरफ़ से भींच लेती है
तुम्हारी चुप्पियों की झील में हम डूब जाते हैं
ख़ुशी मिलती नहीं कोई मुसलसल ग़म ही पाते हैं !

कि जिसको जान कहते हो उसी की जान लेते हो
कहो कोई किसी से इस तरह भी प्यार करता है !

यहाँ काजल बहा इतना कि बह बह थक गया सोचो
हमारा दिल भी ज़िद कर कर के कितना झक गया सोचो

बिना देखे हुए तुमको तसल्ली लापता अपनी
ज़रा सी बात कर लो मानते हैं हम ख़ता अपनी

मिलाओ फ़ोन हमको और धीरे से हेलो बोलो
कोई क्या प्यार करके प्यार से इंकार करता है !

हमारे प्यार की पाकीज़गी को तुम नहीं समझे
हमारी ज़िंदगी की बंदगी को तुम नहीं समझे
हमारा दिन तुम्हीं से है हमारी रात भी तुमसे
हमारी बात भी तुम हो हमारी बात भी तुमसे

कि जिसको याद रखना है उसे तुम भूल ना जाओ
ख़याल इतना हमें रह रह बड़ा बीमार करता है !

©अंकिता सिंह


 

गुण सदा अभिव्यक्त होंगे!

फूल की ख़ुशबू बँधी क्या?सूर्य की किरणें रुकीं क्या?
कर्म से घिस घिस निखर कर गुण सदा अभिव्यक्त होंगे!

जब हठी निर्झर धरा पर अवतरण की ठान लेता
पर्वतों से झट उतर कर प्रस्तरों को चीर देता
वेग से वीरान में बढ़ता अकेला पथ बनाता
और उसका नाद धरती से गगन तक गूँज जाता

रोक पाई है उसे कोई शिला भी चाहकर क्या ?
गूँजती आवाज़ से हर मौन के भ्रम नष्ट होंगे!

चंद्रमा के प्यार से सागर लबालब जब गया भर
और ऊपर और ऊपर उठ गया है साँस भर कर
रौंदने का दम नहीं रखती हवा भी सनसनाती
बस उसे चुपचाप प्रकृति देखती है मात खाती

शक्तिशाली चीख़ती लहरें रुकेंगी क्या किसी से
राह में अवरोध ज़िद्दी आ गए तो,ध्वस्त होंगे !

©अंकिता सिंह


 

पता ना चला!

चाँद का रूप रँग देखते देखते
बस तुम्हें अनवरत सोचते सोचते
भोर ने कब बुहारा सपन का महल
सच कहें तो हमें कुछ पता ना चला !

केश में जो गुँथे मोगरे मालती
रातरानी में घुल घुल महकते रहे
रात आने से पारा गिरा तो मगर
फूल से हम लिपटकर दहकते रहे

प्रश्न का शून्य उत्तर मिला मौन से
रुँध गया पूछते पूछते ये गला!

आँख से तो सरलता से आया निकल
अश्रु जिसने नयन से लिया है जनम
भाव जन्मा हृदय से हृदय में रहा
शब्द में भी उसे ढाल पाए न हम

रह गया अनकहा सब धरा का धरा
अनकहा भी खला अनसुना भी खला!

दूर जाती हुई क्षीण पदचाप ने
रख दिया है हमें आज झकझोर कर
टूट कर हम अखण्डित अमर प्रेम से
ताकते चंद्रमा ये जगत छोड़ कर

वक़्त के साथ चलकर बदलने लगें
हमको आती नहीं चंद्रमा सी कला!

©अंकिता सिंह


 

ताल में मन के निरंतर तुम उतरते जा रहे हो ी

ताल में मन के निरंतर तुम उतरते जा रहे हो
एक हलचल सी मचा कर शांत हो मुस्का रहे हो
भाव की उठती तरंगों में न ख़ुद हम डूब जायें
थाम लो तुम हाथ साथी!थाम लो तुम हाथ साथी!

तुम बड़ा धीमे उतरते जा रहे हो ताल में पर
आ रहीं सारी तरंगें कल्पना का चाँद छू कर
इन उठी उद्दाम लहरों से भला कैसे बचेंगे
हाथ थामोगे न तुम यदि तो अकेले क्या तरेंगे ?

आठ पहरों में कभी भी तुम हमें ना छोड़ जाना
तुम हमारा हो दिवस और तुम हमारी रात साथी!

प्रेम का था मेघ बरसा तब भरा है ताल जल से
युग युगांतर से प्रतीक्षा थी तुम्हारी ना कि कल से

पग पखारा जब तुम्हारा मोक्ष इसको मिल गया है
देख लो बस इस ख़ुशी में एक नीरज खिल गया है

छलछलाता मन हमारा हाय! क्या अब सोच पाए
तुम हमारी बात पहली और अंतिम बात साथी!

फूल शब्दों के बहा कर ताल का शृंगार कर दो
कुछ कहो तुम कुछ कहें हम प्रीत में उद्गार भर दो
मौन की तुम मत कसौटी पर कसो इस व्यग्र मन को
छू स्वरों से सिक्त कर दो हर्ष में हर एक कण को

फूल,मोती,स्वर्ण,हीरा सब लगे कंकड़ सरीखे
है बहुत अनमोल हमको बस तुम्हारा साथ साथी !

©अंकिता सिंह


 

मैं निरंतर ध्यान में हूँ !

मैं तुम्हारे प्रेम के एकांत में खोई हुई हूँ
मौन में सिमटी हुई मैं शब्द के अवसान में हूँ
मैं निरंतर ध्यान में हूँ !

मन अचंचल बन किसी हिमकण सरीखा जम गया है
स्रोत है जो भावना का,जा उसी में रम गया है
बंधनों में बँध गई या मुक्त जैसे हो गई हूँ
प्यास में हूँ मैं अभी या तृप्त जैसे हो गई हूँ

बस तुम्हीं स्पष्ट हो,कुछ भी नहीं स्पष्ट है अब
मैं नहीं ब्रम्हाण्ड में,ना मैं स्वयं के प्राण में हूँ !
मैं निरंतर ध्यान में हूँ!

सुख रहे या दुख रहे अब गौण सब कुछ हो गया है
शोर था कोई हृदय में,मौन में घुल खो गया है

रुक गई हूँ वक़्त के पद चिन्ह पर जैसे अटककर
रुक गया सावन वहीं पर रुक गए बादल वहीं पर

भाग्य में पतझर न जिसके,फूल अमृत से सिंचें हो
लग रहा है दूसरे ही लोक के उद्यान में हूँ !
मैं निरंतर ध्यान में हूँ!

माँग लूँ अब और क्या जब मैं अभावों में नहीं हूँ
प्रेम की बनकर नदी मैं युग युगांतर तक बही हूँ
लक्ष्य मुझको बाँह में भर ख़ुद समेटे घूमता है
कष्ट कोई क्या बचेगा,प्रेम ही जब चूमता है

मैं विकलता से परे हूँ,धैर्य हाथों में धरे हूँ
सामने घनश्याम के बैठी,उजागर ज्ञान में हूँ !
मैं निरंतर ध्यान में हूँ!

©अंकिता सिंह


 

कलयुग

अच्छाई की जीत हुई है
मैंने माँ से यही सुना है
पर कलयुग में जीते जीते
मुझे बुराई की शिकस्त का
सच पूछो तो इंतज़ार है !
सच पूछो तो इंतज़ार है !!

राम सरीखे दिखने वाले
घूम रहे हैं कितने रावण
कलयुग की लंका को देखो
मिला नहीं है एक विभीषण,
आज खो गए भरत शत्रुघन,जैसे पात्र रमायण वाले
चिर निद्रा से फिर भी हनुमत के जगने का ऐतबार है !

एक नहीं हैं यहाँ हज़ारों
द्रौपदियों पर संकट आया
दु:शासन से उन्हें बचाने
कौन विकर्ण कहाँ लड़ पाया
चीख़ों की प्रतिध्वनियाँ ही अब चीख़ों का बस इक उत्तर हैं
कृष्ण उतर आओ धरती पर,देखो श्रद्धा तार तार है !

मीठे स्वर को कर्कश स्वर से
कई बार दब जाते देखा !
मानवता को बर्बरता से
कई बार शर्माते देखा
कुटिल बुद्धि की हर चौसर पर मैंने देखा सत्य हारते
मगर मुझे विश्वास सत्य की तलवारों में तेज़ धार है !

©अंकिता सिंह


 

दर्द ने सुला दिया

थकी थकी पलक जगीं
कई दिनों तलक जगीं
मगर मुझे दे थपकियाँ
दर्द ने सुला दिया ....

कि सिसकियों की लोरियाँ
मुझे सुनाए अनवरत
बड़ा अजीब दर्द है
सदा रहा निकट निकट

नयन धुलाए नीर से
छुई ललाट पीर से
पालना झुला दिया !

बदल रही थी करवटें
कभी इधर कभी उधर
चली थी नींद खोजने
मैं ध्वस्त स्वप्न के नगर

तो दर्द से दो बात कर
पराई पीर याद कर
स्वप्न को भुला दिया !

दर्द ने सुला दिया !

©अंकिता सिंह


 

युग युग प्यार किया है तुमको,युग युग तक करना बाक़ी है

मधुर मिलन में विकल विरह में,इसी अर्थ तक पहुँच सके हम
युग युग प्यार किया है तुमको,युग युग तक करना बाक़ी है !

पहले परिचय के भी पहले
से हमने तुमको जाना है
लगता है इन काली आँखों
को जन्मों से पहचाना है
अनगिन बार जिए हैं तुमसे,तुमपर अनगिन बार मरे हैं
और अभी भी दिल का तुमपर,कई बार मरना बाक़ी है !

कानों में स्वर घुले तुम्हारे
तो मन का चातक चहका है
जब जब छुए गए हम तुमसे
तन का अमलताश दहका है

सेमल के अंगारों जैसे उड़ते रहते ख़्वाब हमारे
और कई अंगारों का तो डाली से झरना बाक़ी है !

तुम्हें सुमिरते तुम्हें सोचते
रातों ने है भोर जगाई
ओढ़ आस का आँचल सिर पर
तुमको है आवाज़ लगाई
आँसूँ के गिरने से पहले, तुमने आकर आँसूँ पोंछे
आँसूँ तो तर गया हमारा,अभी हमें तरना बाक़ी है !

©अंकिता सिंह


 

मुक्त कर दो !

प्रेम के झूठे गले अनुबंध से तुम मुक्त कर दो,
तुम मुझे आज़ाद कर दो,
हाँ!मुझे आज़ाद कर दो !

थक गयी हूँ एकतरफ़ा प्यार का मैं बोझ ढोकर
मान लूँगी राह में मुझको लगी है एक ठोकर
तुम नहीं तो मैं स्वयं अपना ज़रा सा ध्यान रख लूँ
पास मेरे जो अना है उस अना का मान रख लूँ

और कुछ चाहा नहीं है आज बस ये चाहती हूँ
ख़्वाहिशों की ना सही पर हौसलों की माँग भर दो !

रोज़ जिम्मेदारियाँ ही घोंटतीं अधिकार का दम
साथ तुम देते नहीं हो साथ रहते ढेर से ग़म
प्यार के तुम हर शहर की हर गली को नाप आए
और चाहो प्यार मेरे द्वार से ही लौट जाए

मत जलाओ तुम उसे जो उम्र भर जलता रहा है
हो सके तो रात के ही हाथ में इक प्रात धर दो!

दर्द भोगा हो कभी तो आज उसको याद कर लो
दूसरे को उस तरह का तुम कभी उपहार मत दो
जब तुम्हें बँधना नहीं है,प्रीत की डोरी न बाँधो
फूल से नफ़रत अगर हो,शूल छद्मों के न साधो

भूल सकती हूँ मगर ज़्यादा न दूँगी वक़्त तुमको
तुम कहीं एहसास करने में न इतनी देर कर दो !

©अंकिता सिंह


 

मेरा कुछ अधिकार नहीं है !

जिसके चरणों में श्रद्धा से
तन मन के सब फूल समर्पित
मन मंदिर के उसी देव पर
मेरा कुछ अधिकार नहीं है !

जब तक चलती रही आरती
तब तक ही वो रहा सामने
हाथ छुड़ाया उसने अपना
जब जब उसको गई थामने
वो दोषी है या कि नहीं है या दोषी ये भाग्य कि जिसमें
युग युग लम्बा विरह लिखा है क्षण भर का अभिसार नहीं है !

जिसे दूर करनी थी पीड़ा
उसने ही आँसूँ दे डाले
जिनको भरना था निज मधु से
तोड़ दिए उसने वो प्याले
मन चंदन घिस घिस कर मैंने जिसके माथे तिलक लगाया
वही देव हाँ! वही देव वो,मुझमें एकाकार नहीं है !

रघुवर को पूजा सीता ने
बदले में तो बस दुख पाया
कान्हा को पूजा मीरा ने
जीवन भर में क्या सुख पाया ?
जितना प्रेम किया राधा ने उतनी पीड़ा पड़ी झेलनी
मेरे संग ऐसा हो जाना कोई पहली बार नहीं है !

©अंकिता सिंह


 

शहीद की पत्नी का दर्द

वो दुनिया जो एक धमाके
से पल भर में सिहर गयी थी
पायल चूड़ी की खनखन जो
एक ख़बर से बिखर गयी थी
प्यार भरे कुछ बीते पल जो,
टी वी वाले दिखा रहे हैं ,
जब सारा जग भूलेगा क्या,
तब भी उनको याद रखोगे ?
क्या तुम मुझको याद रखोगे ?

भीड़ भरी है जो आँगन में
कल परसों सब छँट जाएगी
सिर्फ़ देहरी सिसक सिसक कर
मेरे संग पीड़ा गाएगी ,
मान अशुभ इस धवल वेश को
कौन मुझे देगा आमंत्रण ?
जिस घर का बनना बाक़ी था,
उसमें मैं चीख़ूँगी क्षण क्षण

मेरी इस नन्हीं दुनिया की
चमक सिर्फ़ जो तुम से ही थी
दूर सितारों के मेले में
क्या उसको आबाद रखोगे ?
क्या तुम मुझको याद रखोगे ?

आज शहादत परस रहे जो
वे अख़बार पराए होगें ,
देशद्रोह अपराधों वाली
ख़बरों से जब छाए होगें ,
कहीं बेटियां बेचीं जायें
कहीं कोई बेचेगा सरहद ,
कुछ सिक्कों की ख़ातिर ये जब
पार करेंगे अपनी हर हद
आज़ादी की अस्मत को जब
ये सब तार तार कर देंगे
तब भी अपने बहे लहू से,
क्या उसकी मरजाद रखोगे ?
क्या तुम मुझको याद रखोगे ?

कामदेव वाली ऊँगली पर
भाभी ने जब तिल देखा था
प्राण तुम्हारी उसी तर्जनी
पर विराट सा दिल देखा था
दिल ऐसा जिसको अपनों की
बातें रखना ख़ूब पता है
दिल जिसको निज आन-बान की
ख़ातिर मरना ख़ूब पता है ,
जब जब वर्दी को छू कर मैं ,
सदा सुहागिन का वर माँगू ,
तब बोलो क्या वापस आकर
मेरे सिर पर हाथ रखोगे ?
जब सारा जग भूलेगा क्या,
तब भी उनको याद रखोगे ?
क्या तुम मुझको याद रखोगे?

©अंकिता सिंह


 

मनचाहा मन मिला नहीं है !

धरती के सारे कोनों को
हमने अब तक छान लिया है
और गगन के चाँद सितारों
को हमने पहचान लिया है
पर हमको अब तक दुनिया में
मनचाहा मन मिला नहीं है !

कहीं बात में स्वाद न आया
कहीं बात को तरस गए हम
चाहे जो भी बात रही हो
मन का आँगन रहा सदा नम !
मन के इस गीले आँगन को,कोई सूरज मिला नहीं है
और कभी मन के सूरज को,गीला आँगन मिला नहीं है !

घावों को जो भर दे ऐसी
मिली न हमको प्रीत पराई
देख न पाया जगत अभी तक
उधड़े मन की ये तुरपाई
कोई छलता रहा सदा ही,कोई खेल रहा है खेला
जो भीतर बाहर दिखलाए,ऐसा दर्पण मिला नहीं है

धन के कल्पवृक्ष पर हमने
फूल भाव का एक न देखा
धन के हाथों में देखी पर
कितने ही रिश्तों की रेखा
सम्बन्धों की डोर खींचकर,सबको अपना बता रहे हैं
बिन बांधे ही बाँध सके जो,ऐसा बंधन मिला नहीं है !

©अंकिता सिंह


 

प्रेम में ये गीत पगकर मोक्ष पाते जा रहे हैं !

मोह माया की डगर चल मोक्ष मिल सकता नहीं पर
प्रेम में ये गीत पग कर मोक्ष पाते जा रहे हैं !

सुख लिखा जब जब मिलन का तो जगत ने ख़ूब गाया
दुख लिखा जब जब विरह का तो जगत को ख़ूब भाया
प्रेम में तो हर किसी का एक सा अनुभव रहा है
प्रेम से ही,गीत से ही जीव में उत्सव रहा है

आत्मा तो देह नूतन धर धरा पर लौट आती
कंठ फिर भी गीत वो ही गुनगुनाते जा रहे हैं !

हर हृदय में आ गए हैं हर अधर पर आ गए हैं
सृष्टि में ये सात सुर का रूप धर कर आ गए हैं
प्रेम की पीड़ा यही हैं प्रेम का उद्गार भी ये
प्रेम की भाषा यही हैं प्रेम की मनुहार भी ये

प्रेम का दीपक जलाते जा रहे संसार में ये
क्या बुझेंगे प्रेम से जो झिलमिलाते जा रहे हैं !

©अंकिता सिंह


 

घंटों तक तुमसे बातें की !

घंटों तक तुमसे बातें की
फिर भी कितनी बात बची है
उन होठों से इन होठों तक
आने को सौग़ात बची है !

पर्वत से भारी मन को भी
बादल सा हल्का पाया था
साँसों पर फैला साँसों का
झीना झीना इक साया था
एक रात जब तुम में सोकर सुबह जगाया मैंने ख़ुद को
तब से हर दिन ये गिनती हूँ ,दिन में कितनी रात बची है !

जाड़ों की ठंडी रातों में
अहसासों को जलते देखा
गरमी की झुलसी शामों में
ख़ुद को भीतर जमते देखा
मुझको लगता था मुझमें हर मौसम का मिटना लिक्खा है
तुम बरसे जब मुझ पर जाना,मुझमें इक बरसात बची है !

हरसिंगार बिखर जाए ज्यों
धूल भरी तपती धरती पर
सारी धूप निगल जाए ज्यों
बादल सिर के ऊपर आकर
ऐसा कुछ महसूस किया है मैंने गुज़रे इन लम्हों में
नींद उड़ी पलकों से अब बस सपनों की बारात बची है !

©अंकिता सिंह


 

तुम्हारा प्यार माँगा है !

झुका कर शीश ये अपना करों को जोड़कर अपने
प्रभु से आज वंदन में तुम्हारा प्यार माँगा है
नहीं माँगा कनक कुंदन नहीं माँगा रतन नीलम
तुम्हारी बाँह का अनमोल अनुपम हार माँगा है ..

मेरा तो चाँद भी हो तुम मेरी आँखों का तारा भी
बुझा दे प्यास जो मन की वही नदिया की धारा भी
समंदर नेह का हो तुम मेरे सपनों का अम्बर हो
चमकता प्रेम जैसे शब्द का हर एक आखर हो
तुम्हें माँगा है तो समझो सकल संसार माँगा है ...

सभी की श्वास गिनती की व क्षणभंगुर ये काया है
कहा जग ने कि पावन प्रेम भी बस एक माया है
मगर मैं आज ईश्वर से अमरता का पहर माँगू
तुम्हारी साँझ माँगू मैं तुम्हारी ही सहर माँगू
मेरे मन पर तुम्हारे प्रेम का सिंगार माँगा है ...

कथा जीवन की आधी है इसे उत्कर्ष दे दो तुम
दबी सी भावना उसको नया इक अर्श दे दो तुम
हँसी के नाद से अपने ज़रा सुख को जगा दो तुम
सुनहरे रंग से जीवन का हर कोना सजा दो तुम
मना पाऊँ जो सारी उम्र वो त्योहार माँगा है ...

©अंकिता सिंह


 

मैं तुमको याद करती हूँ !

अकेले बैठ कर तुमको कभी जब याद करती हूँ
मैं तुमको याद करती हूँ ...हाँ!तुमको याद करती हूँ
मैं रोना मुस्कुराना हाय!दोनों साथ करती हूँ !

यहीं सोफ़े पे बैठे सात अम्बर घूम आती हूँ
तुम्हारा नाम चखती हूँ नशे में झूम जाती हूँ
कहाँ हूँ मैं जहाँ मेरी ख़बर मुझ तक नहीं आती
क्या मेरी गुमशुदी की ये ख़बर तुम तक नहीं जाती
गली दिल की तुम्हारी याद से आबाद करती हूँ !

तेरा जाना मेरी आँखों में प्यासे ख़्वाब बोता है
तेरा तकिया लिपटकर मुझसे सारी रात सोता है
तेरी ख़ुशबू मेरी साँसों की गलियों में टहलती है
बड़ी कमबख़्त है ये याद आँखों में पिघलती है
मैं सारी रात सोना जागना इक साथ करती हूँ !

तेरी बातों के फूलों से ग़ज़ल मख़दूम करती हूँ
मैं चुपके से तेरी डीपी को जब भी ज़ूम करती हूँ
तेरी फूँकी हुई सिगरेट में अक्सर राख होती हूँ
तेरी लत में कभी धुआँ कभी मैं ख़ाक होती हूँ
मैं अपने ज़ख़्म पर अश्क़ों की ख़ुद बरसात करती हूँ !

©अंकिता सिंह


 

तुम्हारा प्रेम बादल है

तुम्हारा प्रेम बादल है धरा सा चित्त है मेरा
लगी थी सूखने वसुधा तुम्हीं से प्राण पाया है
बिना अभिसार के जीवन लगे मरुथल मुझे कोई
घुमड़कर फिर बरस जाओ कि मैंने गीत गाया है

कई नवजात स्वप्नों की नवल सी चेतना तुम हो
विरह में झर रही आँखों की नीरव वेदना तुम हो
भई मैं चातकी कोई अधूरी उर पिपासा है
पपीहे सी विकल हूँ मैं घटा से मुझको आशा है
तुम्हारी याद के काजल से नैनों को सजाया है .......

ज़रा सा बाँह में भर लो ज़रा सा जी तो लूँ जीवन
ज़रा किरणों को थामू मैं तमस से तोड़ दूँ बंधन
धुरी हो तुम धरा हूँ मैं अचल सा प्यार है मेरा
तुम्हारी मुस्कुराहट बिन ये जीवन क्षार है मेरा
तुम्हारी मुस्कुराहट में सिमट ब्रह्मांड आया है ....

कभी देते हो जब दर्शन रसित हो गूँजता क्षण क्षण
तुम्हारे पथ की रज बनने मचल जाता सकल कण कण
हृदय की थाप पर साँसे करे हैं आज अभिनंदन
हवा में घोल कर स्वर कंठ का भेजा है आमंत्रण
निमंत्रण पंथ पर आओ हृदय पथ ने बिछाया है ...

©अंकिता सिंह


 

शारदे वंदन

मातु कर कृपा मुझे सरस सरस विचार दे
भक्त की क़लम नयी उसे अकुंठ धार दे
बुद्धि दे विवेक दे मुझे हे माँ सरस्वती
शब्द व्यंजना व शिल्प को नया निखार दे!

दे मुझे प्रसाद माँ की मान ये झुके नहीं
और पाँव का प्रबल उछाह भी थके नहीं
ज़िंदगी रही बिखर उसे सटीक सार दे
हाथ ले पकड़ मुझे माँ पीर से उबार दे !

रक्त के प्रवाह संग शक्ति का प्रवाह कर
उर व रोम रोम में उमंग की तरंग भर
प्राण के बड़े बड़े विकार को सँवार दे
कंठ से लगा मुझे बहुत दुलार प्यार दे!

©अंकिता सिंह


 

हम मिले और मिल कर बिछड़ भी गए

हम मिले और मिल कर बिछड़ भी गए,
मन का हर एक आखर रहा अनकहा।
देह का खोखला आवरण शेष है,
ख़ुद का ख़ुद में न कुछ अंश बाक़ी रहा !

नव्य सावन अभी द्वार आया ही था,
आँख के भाद्र संग बह गया पल में वो।
सुर्ख़ कोपल अभी जगमगायी ही थी,
फँस गयी निर्दयी भाग्य के छल में वो।
एक टूटा हृदय हाथ में थामकर ,
कष्ट आहों के संग अश्रुओं में बहा!

प्राण तक तज दिए प्रेम के वास्ते,
प्रेम का नाम रौशन तो उन ही से है।
प्रेम चूमें सफलता शिखर झूमकर,
भाग्य में ऐसा लिक्खा तो विरलों के है।
इस कथा में वो अपवाद हम ना बने,
किंतु दुःख तो तनिक हमने कम ना सहा!

स्वप्न जिनसे थी जीवित चमक आँख की,
जाने क्यों दूजी आँखों में चुभने लगे।
प्राण में घोल देते थे जीवंतता,
ऐसे अभिसार के क्रम भी थमने लगे।
पीर आकाश से भी वृहद हो गयी,
भाव का जब भी संसार नीरव दहा!!

©अंकिता सिंह


 

हो गया है यक्ष जैसा मन!

देख कर आकाश में उड़ते हुए बादल ....
भीगकर सहसा तुम्हारी याद में पागल
हो गया है यक्ष जैसा मन !!!!!!
हो गया है यक्ष जैसा मन!

दे दिया है बादलों को पत्र मैंने
मन करे तो बाँच लेना प्यार मेरा
मात्र अक्षर की नहीं ये शब्द माला
है विकलता का सघन संसार मेरा,

बिन तुम्हारे मन बना वीरान सा मरुथल
एक मृगतृष्णा चिढ़ाती है मुझे प्रतिपल
जबकि आँखों में घिरा सावन!

अनगिनत कोशिश विकल मन कर चुका है
पर विवशता को नहीं है लाँघ पाया
पिस गया धरती गगन के बीच में पर
एक क्षण तुमको नहीं इसने भुलाया

ये हवा छू खोलती है याद के साँकल
तुम बजा देते थे ऊँगली से मेरी पायल
जी हुआ है देख लूँ दर्पण!

बारिशों से भर रहे हैं ताल नदियाँ
और ये मन रिक्त होता जा रहा है,
ख़त्म होंगे कब विरह के ये निठुर पल
प्रेम भी अस्तित्व खोता जा रहा है!

भावना के पर्वतों पर मन पड़ा घायल..
जो चपल था भूल बैठा आज हर हलचल
छू इसे दे दो नया जीवन!

©अंकिता सिंह


 

एक सूरज मुस्कुराकर आज मेरे नाम कर दो !

एक सूरज मुस्कुराकर आज मेरे नाम कर दो,
हे प्रिये!तुम इस तमस में इक प्रकाशित पुंज भर दो !

आज बनकर इक शलभ मन,प्राण तक चाहे लुटाना,
चाहता है ये नहीं अब प्रेम को किंचित छुपाना,
हैं मचलतीं उर तरंगें प्रेम के उत्कर्ष को अब ,
भर गया उन्माद इनमें मुस्कुराए तुम प्रिये जब ,
चूम पायें सूर्य को ये ,आज ऐसा एक वर दो !

बिन तुम्हारी मुस्कुराहट के सुबह भी रात सम है,
रात जिसमें पूर्णिमा के चाँद का आलोक कम है,
मन किसी सूरजमुखी सा अब प्रतिक्षारत खड़ा है,
रश्मि के स्पर्श को ये बाँवरा आकुल बड़ा है,
मुस्कुराकर रात को तुम गुनगुनी सी इक सहर दो !

वो पहर जिसमें शेफाली पुष्प धरती पर बिखरते,
वो पहर जिसमें किरण को छू नवल पल्लव निखरते,
वो पहर जिसमें तपस्या जुगनुओं की पूर्ण होती,
वो पहर जिसमें तमस की स्वामिनी भी तेज खोती,
ज़िंदगी में भोर वाले तुम कई ऐसे पहर दो !!

©अंकिता सिंह


 

तुम हमारी चेतना हो !

तुम हमारी चेतना हो, सोच हो, संवेदना हो,
क्या करें ? तुमसे अलग कुछ सोचना आता नहीं है!

ध्यान पर बैठें कभी तो ध्यान में भी शेष हो तुम
शून्यता पाना असम्भव,भाव का आवेश हो तुम
खो चुके तुममें,तुम्हीं को खोजते दिन रात हैं हम
जो शुरू तुमसे,तुम्हीं पर ख़त्म हो वो बात हैं हम

दूर कितना आ गए हैं खोजते तुमको हुए हम
तुम मिलो या ना मिलो अब लौटना आता नहीं है !

शांति का तुम रास्ता हो,व्यस्तता के जंगलों में
और हलचल हो हृदय की शांत फ़ुर्सत के पलों में
नेह मलयानिल तुम्हीं हो,नेह की हो उष्णता भी
रिक्तता भी हो हृदय की,हो हमारी पूर्णता भी

सामने तुम हो न हो पर दृश्य तुम ही हो दृगों का
अब परे इसके हमें कुछ देखना आता नहीं है !

साँस का हर तार तुमसे,तार की झंकार भी तुम
गीत का उदगम तुम्हीं से ,गीत की गुंजार भी तुम
मुस्कुराहट हो हमारी,अश्रुओं की पंक्ति भी हो
मन द्रवित कर दो क्षणों में,पर हमारी शक्ति भी हो

डूबते ही जा रहे हैं जान कर ख़ुद प्रेम में हम
तृण बचा ले जो हमें वो थामना आता नहीं है !

©अंकिता सिंह